Suvichar
"*किसी कवि ने क्या खूब लिखा है।*👌
*बिक रहा है पानी,*
*पवन बिक न जाए ,*
*बिक गयी है धरती,*
*गगन बिक न जाए*
*चाँद पर भी बिकने लगी है जमीं .,*
*डर है की सूरज की तपन बिक न जाए ,*
*हर जगह बिकने लगी है स्वार्थ नीति,*
*डर है की कहीं धर्म बिक न जाए ,*
*देकर दहॆज ख़रीदा गया है अब दुल्हे को ,*
*कही उसी के हाथों दुल्हन बिक न जाए ,*
*हर काम की रिश्वत ले रहे अब ये नेता ,*
*कही इन्ही के हाथों वतन बिक न जाए ,*
*सरे आम बिकने लगे अब तो सांसद ,*
*डर है की कहीं संसद भवन बिक न जाए ,*
*आदमी मरा तो भी आँखें खुली हुई हैं*
*डरता है मुर्दा , कहीं कफ़न बिक न जाए.*
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