Shayari
"पकड़ हाथों की हाथों पर,क्यों ढीली लग रही हमको
मुहब्बत की सनम मिट्टी ,क्यों गीली लग रही हमको
पका के रक्खा था जिस बुत को ,अपने नेक इरादों से
वही मूरत ये उल्फ़त की,क्यों सीली लग रही हमको
ज़रुरत क्यों अब लगती है, मुहब्बत आज़माने की
कभी मज़बूत थी जो बाँह, लचीली लग रही हमको
ज़हर से हों बुझे जैसे क्यों लगते आज सब नग़में
इश्क़ की शीरीं सी भी बात,क़सीली लग रही हमको
हमारे पास आने से क्यों, चेहरा ज़र्द है उनका
ख़ुशी की बात छोड़ो काया,ही पीली लग रही हमको
♥♥♥♥"